📰 बड़ी खबर सतना से | 12 वर्षों से सड़क किनारे पढ़ाई-मजबूर: शिक्षा के दावों की पोल खुली | K C News सतना
सतना, मध्य प्रदेश – 10 नवंबर 2025
मध्य प्रदेश के सतना जिले में शिक्षा नामक मूलभूत अधिकार का दरवाज़ा खुला नहीं बल्कि दरवाज़ा खोले हुए खंडहर जैसा दिख रहा है। नागौद विकासखंड की ग्राम पंचायत इटमा सहित कई अन्य गाँवों में सरकारी विद्यालय के नाम पर सड़क किनारे खुली हवा में कक्षाएँ चल रही हैं, जबकि भवन निर्माण के लिए स्वीकृत राशि वर्षों से फाइलों में दबी हुई है। यह मामला सिर्फ इटमा का नहीं, बल्कि पूरे रीवा-सतना संभाग की शिक्षा व्यवस्था का आईना है।
🏫 मामला-परिस्थिति: सार में
इटमा गाँव के प्राथमिक विद्यालय में वर्तमान में मात्र 19 छात्र-छात्राएं नामांकित हैं। लेकिन स्कूल भवन नहीं है — छात्रों को धूल-धक्कड़ और बारिश-गर्मी के बीच सड़क किनारे पाठशालाओं में बैठकर पढ़ना पड़ रहा है। सरकारी सूत्र बताते हैं कि भवन निर्माण के लिए ₹10 लाख से अधिक की राशि स्वीकृत हुई थी, पर भूमि उपलब्ध नहीं हो सकी, इसलिए निर्माण शुरू नहीं हो पाया।
दूसरी ओर, उचेहरा विकासखंड के डुड़हा प्राथमिक विद्यालय में एक ही कमरे में एक-साथ 95 बच्चे, 5 ब्लैकबोर्ड के बीच पढ़ाई कर रहे हैं।
⚠️ कितना गहरा संकट है?
सड़क किनारे पढ़ने को मजबूर बच्चों की तस्वीर सिर्फ प्रतीक नहीं, बल्कि वास्तविकता है। बारिश में खुली कक्षा अस्थिर हो जाती है, गर्मी में बच्चों को छाया नहीं मिलती, और गर्म पक्की छत-फर्श से बचाव भी नहीं है। गाँव के एक शिक्षक ने कहा:
“हम कोशिश करते हैं, लेकिन परिस्थितियाँ हमारे हाथ से बाहर हैं।”
शिक्षा विभाग के आंकड़े देखें तो सतना जिले में दर्ज-अधर्मित रूप से कई स्कूल ऐसे पाए गए हैं जिनमें भवन-विभाजन, शिक्षक-संख्या या मूलभूत सुविधाएं भी अनुपस्थित हैं। समस्या सिर्फ एक गाँव की नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था की है।
📌 ग्रामीणों की सूचनाएँ और शिकायतें
ग्राम इटमा के शिक्षक व ग्रामीण बताते हैं कि 12 वर्षों से वे दैनिक सरकार से शिकायत करते आ रहे हैं — पर जमीन नहीं मिली, निर्माण नहीं हुआ।
एक सर्वेक्षण के अनुसार:
- परित्यक्त भवन के कारण बच्चों को पेड़-के नीचे-सड़क-किनारे पढ़ना पड़ता है।
- छात्रों को कपड़े, किताब-कॉपी के लिए भारी-खर्च उठाना पड़ रहा है।
- शिक्षकों की कमी और एक-कमरे-में-कई-क्लास का दुष्प्रभाव अध्ययन-प्रभावशीलता पर पड़ा है।
ग्रामवासियों ने तहसीलदार को ज्ञापन सौंपा है और कहा है:
“दस लाख रुपये आए, लेकिन हमारी जमीन ही नहीं मिली — हमारी लड़ाई सिर्फ पढ़ाई की नहीं, न्याय की है।”
🧑🏫 विभागीय और शिक्षा-विशेषज्ञों की प्रतिक्रिया
सतना जिले के शिक्षा अधिकारी ने कुछ महीने पहले कहा था कि “हम स्थिति सुधारने की दिशा में हैं”, लेकिन स्थानीय स्कूल-घटनाओं से लगाया जाता है कि लंबित काम और नीति-व्यवस्था में विफलता वास्तविक कारण है।
शिक्षा विशेषज्ञ डॉ. आर. पी. शर्मा कहते हैं —
“अगर बच्चों को सुरक्षित, स्थायी भवन नहीं मिलेगा तो पढ़ाई-दृष्टि से हम आगे नहीं बढ़ सकते। यह बच्चों का शायद नहीं, बल्कि बच्चों का भविष्य छीने जाने जैसा है।”
📉 परिणाम और प्रभाव
- पढ़ाई की गुणवत्ता गिर रही है — ध्यान-भटकाव, बाधित कक्षाएँ, शिक्षक-प्रेरणा में कमी।
- अभिभावक और शिक्षक चिंतित हैं कि पढ़ाई जारी रहने की स्थिति न बन सके।
- सरकार द्वारा चलाई गई ‘स्कूल चलें हम’ और ‘सब पढ़ें, सब बढ़ें’ जैसी योजनाओं पर भरोसा प्रभावित हुआ है।
- आने वाले वर्षों में इस क्षेत्र के बच्चों को प्रतियोगी परीक्षाओं, उच्च शिक्षा के लिए कठिनाइयाँ बढ़ सकती हैं।
🛠️ समाधान-मंज़िल: क्या होना चाहिए?
- भूमि का तुरंत अधिग्रहण — स्वीकृत राशि है, पर ज़मीन नहीं। जिला प्रशासन को प्राथमिकता देनी चाहिए।
- जल्द-से-जल्द भवन निर्माण — एक-दो माह में टेंट-क्लास से स्थायी भवन की ओर बढ़ना चाहिए।
- फील्ड-मॉनिटरिंग टीम — विभाग-अधिकारियों का फील्ड-विजिट अनिवार्य बनाया जाना चाहिए।
- शिक्षक-संकुल समस्या का समाधान — एक कमरे में कई क्लास न हों, सुविधाएँ बढ़ाई जाएँ।
- समुदाय-सक्रियता — ग्राम-सोसायटी, शिक्षक-माता-पिता कमेटी मिलकर स्थायी समाधान के लिए दबाव बना सकते हैं।
🧩 निष्कर्ष
शिक्षा एक अधिकार है — पर सतना जिले के इस मामले ने उसे लड़ाई-लड़ने वाला अधिकार बना दिया है। सड़क-किनारे-कक्षा, एक-कमरे-में-पचास-से-अधिक-बच्चे और भवन-बिना-स्कूल जैसी तस्वीरें सिर्फ खबर नहीं, चेतावनी हैं। यदि जल्द कुशल और समर्पित कदम न उठाए गए, तो विंध्य-क्षेत्र की अगली पीढ़ी पिछड़ने के रास्ते पर चल सकती है।
आज की खबर कठोर हकीकत है — और कल की उम्मीद आपके ब्लॉग पाठकों में जाग्रत प्रवक्ता-वर्ग तक ले जाना हम सबकी जिम्मेदारी है।
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