नेत्रहीन बच्चों की जान खतरे में, जर्जर भवन बना मुसीबत
रीवा (मध्यप्रदेश)। शहर में स्थित यमुना प्रसाद शास्त्री नेत्रहीन विद्यालय का भवन पूरी तरह जर्जर अवस्था में पहुंच चुका है। भवन की हालत इतनी खराब है कि किसी भी समय बड़ा हादसा हो सकता है, जिससे यहां अध्ययनरत नेत्रहीन बच्चों की जान पर सीधा खतरा मंडरा रहा है।
चिंताजनक पहलू यह है कि जिन बच्चों पर यह खतरा है, वे न तो देख सकते हैं और न ही आने वाले खतरे का पूर्वानुमान लगा सकते हैं। ऐसे में यदि कोई दुर्घटना होती है, तो इसकी जिम्मेदारी किसकी होगी—यह सवाल पूरे रीवा जिले में चर्चा का विषय बना हुआ है।
जानकारी के अनुसार, इस विद्यालय के भवन का निर्माण स्थानीय अर्जुन सिंह द्वारा लगभग 25 लाख रुपये की सांसद निधि से कराया गया था। यह भवन कभी शिक्षा और संवेदनशील सोच का प्रतीक माना जाता था, लेकिन आज सरकारी उपेक्षा और रखरखाव की कमी के चलते यह बच्चों के लिए खतरे का कारण बनता जा रहा है।
स्थानीय लोगों, अभिभावकों और सामाजिक संगठनों का कहना है कि यदि समय रहते भवन की मरम्मत या नए भवन का निर्माण नहीं किया गया, तो किसी बड़ी अनहोनी से इनकार नहीं किया जा सकता। यह मामला प्रशासन और जनप्रतिनिधियों की संवेदनशीलता की भी परीक्षा है।
मांग की जा रही है कि भवन का तत्काल निरीक्षण कराया जाए, बच्चों को सुरक्षित स्थान पर शिफ्ट किया जाए तथा जल्द से जल्द नए भवन या व्यापक मरम्मत की व्यवस्था सुनिश्चित की जाए, ताकि नेत्रहीन बच्चों की सुरक्षा से कोई समझौता न हो।
सांसद निधि से हुआ था निर्माण: जानकारी के मुताबिक, इस विद्यालय भवन का निर्माण वर्षों पहले सांसद निधि से लगभग 25 लाख रुपये की लागत से कराया गया था। उस समय इसे शिक्षा और संवेदनशील सोच का प्रतीक माना गया, लेकिन समय के साथ रखरखाव की कमी और सरकारी उपेक्षा के कारण यह भवन आज खतरे का कारण बनता जा रहा है। स्थानीय नागरिकों का कहना है कि यदि समय रहते भवन की मरम्मत या पुनर्निर्माण नहीं किया गया, तो किसी बड़ी अनहोनी से इनकार नहीं किया जा सकता। सवाल यह भी उठ रहा है कि यदि कोई दुर्घटना होती है तो उसकी जिम्मेदारी किसकी होगी।
प्रशासन पर लापरवाही के आरोप: इस मामले में प्रशासन की भूमिका पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं। बताया जा रहा है कि कई बार मौखिक और लिखित रूप से शिकायतें की गईं, लेकिन अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। अभिभावकों का आरोप है कि अधिकारियों ने केवल आश्वासन दिए, जबकि जमीनी स्तर पर सुधार के कोई प्रयास नजर नहीं आए।
तत्काल कदम उठाने की मांग: स्थानीय सामाजिक संगठनों और अभिभावकों ने मांग की है कि विद्यालय भवन का तत्काल तकनीकी निरीक्षण कराया जाए। जब तक भवन सुरक्षित घोषित न हो जाए, तब तक बच्चों को किसी वैकल्पिक सुरक्षित स्थान पर स्थानांतरित किया जाए। साथ ही, जल्द से जल्द नए भवन के निर्माण या व्यापक मरम्मत की व्यवस्था की जाए। नेत्रहीन बच्चों की सुरक्षा केवल प्रशासनिक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि सामाजिक दायित्व भी है। ऐसे संवेदनशील संस्थानों की अनदेखी न केवल व्यवस्था पर सवाल खड़े करती है, बल्कि समाज की संवेदनशीलता की भी परीक्षा लेती है। अब देखना यह है कि संबंधित विभाग और प्रशासन कब तक इस गंभीर मुद्दे पर ठोस कदम उठाते हैं।

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